सिंधिया के प्रति दिखती है कांग्रेसियों की आस्था, वीरांगना और गांधी से नहीं है उन्हें कोई वास्ता

गांधी के नाम और उनकी विचारधारा पर चलने वाली कांग्रेस के कार्यकर्ता महापुरुषों के प्रति कितना आदरभाव रखते हैं उसकी वास्तविक तस्वीर बुधवार को देखने को मिली। स्टेशन पर अपने नेता के स्वागत के लिए अनुशासनात्मक तरीके से कतारबद्व हजार कार्यकर्ता नजर आए लेकिन महात्मा गांधी और वीरांगना झलकारी बाई की प्रतिमा पर महज चार। यह इस बात का प्रमाण है कि ग्वालियर में कांग्रेसियों का विश्वासऔर आस्था सिर्फ सिंधिया में ही है वीरांगना और गांधी से नहीं है उन्हें कोई वास्ता |

दृश्य एक: स्थान रेलवे स्टेशन

सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के दिल्ली से ग्वालियर आगमन पर स्टेशन पर कांग्रेस के सैकड़ों कार्यकर्ता सूत लेकर उनका स्वागत करने पहुंचते हैं। महिला और पुरुषों के बीच जमकर धक्का-मुक्की हो रही होती है। वो सिर्फ इस बात को लेकर कि किसी न किसी तरह सिंधिया की चरणवंदना कर अपना चेहरा दिखाया जा सके। इसके लिए नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच होड़ी सी लगी दिखती है।

दृश्य दो: गांधी उद्यान

कांग्रेस के पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत गोडसे की मूर्ति हटने की खुशी में कांग्रेसी सुबह 11 बजे महात्मा गांधी की प्रतिमा पर गांधी उद्यान में उन्हें नमन करने पहुंचते हैं। लेकिन यहां नजारा स्टेशन के ठीक उलट होता है। वहां जहां हर हाथ में सूत की माला थी तो यहां महज चार लोग हाथ में माला लिए खड़े नजर आते हैं। और तो और गांधी के प्रति निष्ठा व्यक्त करने के लिए गिनती के दो दर्जन कार्यकर्ता भी एकत्रित नहीं होते हैं|

दृश्य तीन: झलकारी बाई की प्रतिमा

आकाशवाणी तिराहा स्थित वीरांगना झलकारी बाई की प्रतिमा पर तो स्थिति देखते ही बनती है। वीरांगना के बलिदान दिवस पर उन्हें याद करने वाले कांग्रेसियों का लगता टोटा सा ही पड़ जाता है, गांधी की प्रतिमा पर जितने कांगेेसी थे वे भी घटकर कम हो जाते हैं। महज चार लोग माला पहनाते हैं और करीब आधा दर्जन फोटो खिंचवाकर चलते बनते हैं। वीरांगना के प्रति कांग्रेसियों की यही सच्ची पुष्पांजलि होती है।

यह तीनों दृश्य अपने आप में खुद ही पूरी हकीकत को बयां कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि ग्वालियर में क्या कांग्रेस और कांग्रेसियों के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया ही राजनीति का केंद्र बिंदु बन कर रह गए हैं। उनके आगमन पर अनुशासित सिपाही की तरह नजर आने वाले कांग्रेसी उनके जाते ही सड़कों पर भिड़ते नजर आते हैं। जो लोग चेहरा चमकाने के लिए स्टेशन और महल के बाहर खड़े नजर आते हैं वे धरना -प्रदर्शन के दौरान क्यों नहीं दिखते।

क्या उनकी राजनीति सिर्फ चेहरा दिखाने और सूत की माला पहनाने (मंदसौर में किसानों की हत्या के बाद से सिंधिया ने पुष्पहार पहनना बंद कर दिया है, वो इसलिए कि उन्होंने संकल्प लिया है कि जब किसानों के हत्यारों के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई नहीं होती है और किसानों को न्याय नहीं मिलता तब तक वे पुष्पहार स्वीकार नहीं करेंगे) पहुंचते हैं। य नहीं

कांग्रेसियों में सिर्फ फोटो खिंचवाने और चेहरा दिखाने की होड़

कांग्रेस की ओर से शहर में कोई भी आयोजन हो अधिकांश कांग्रेसियों में चेहरा दिखाने और फोटो खिंचवाने की होड़ सी लगी रहती है। इसके चलते वे बीच सड़क पर धक्का-मुक्की करने से भी बाज नहीं आते हैं। जबकि कई बार इसके चलते महिला कार्यकर्ताओं को खासी परेशानी का सामना करना पड़ता हैै। हालांकि यह कहना भी गलत नहीं होगा कि कांगेस की करीब एक दर्जन महिला नेत्रियों में भी इन दिनों फोटो खिंचवाने और चेहरा चमकाने की होड़ सी लगी हुई है। इस बात को लेकर अनेक आयोजनों के दौरान कई बार उन्हें आपस में लड़ते-झगड़ते देखा गया है। दो तीन नेत्रियां तो लड़ाई-झगड़े के चलते पूरी कांगे्रस कमेटी और मीडिया में चर्चा का विषय बनी रहतीं हैं। सोशल मीडिया पर भी उन्हीं नेत्रियों के सबसे ज्यादा फोटो देखने को मिलते हैं।

ये पहुंचे सिंधिया का स्वागत करने                                                                                                                                                          पूर्व विधायक रमेश अग्रवाल, अशोक शर्मा, सुनील शर्मा, सुरेंद्र शर्मा, संजय शर्मा, बालखांडे, महाराज सिंह पटेल, कृष्णराव दीक्षित, चतुर्भुज धनौलिया, रामसुंदर सिंह रामू, नूरआलम वारसी गुडडू, पंकज शर्मा, नरेंद्र तोमर, सुधा दुबे, कैलाश चावला, सरोज शर्मा, शीतल अग्रवाल, दिनेश शर्मा, गीता वाष्र्णेय, सुनीता तोमर, रुचिका श्रीवास्तव, एनपी आर्य, ऊषा चौहान, ओमप्रकाश दुबे, अरुणा गुप्ता व दिनेश भदौरिया प्रमुख रूप से उपस्थित थे।

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