शिव “राज” में गांधी के हत्यारे का महिमा मंडन, मंदिर बना कर की गोडसे की पूजा

आप जानकार हैरान हो रहे होंगे कि क्या गांधी के हत्यारे का भी कोई मंदिर बनाकर उनकी पूजा अर्चना कर सकता है। तो आप हैरान न हों, यह बिल्कुल हकीकत हैं क्योंकि अब गोडसे लोगों के लिए पूज्यनीय हो गए हैं। ऐसे में गोडसे की प्रतिमा स्थापना को लेकर बवाल मच गया है। महासभा ने इसे अपने लिए गौरव की बात बताया है तो भाजपा ने इस मामले से पल्ला झाड़ लिया है लेकिन कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर आक्रामक हो गई है।

ग्वालियर। महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे अब कुछ लोगों के लिए ईश्वर के रूप में पूज्यनीय हो गए हैं। उनका बाकायदा मंदिर बनाकर प्रतिमा स्थापित की गई। विधिवत तरीके से पूजा अर्चना कर लड्डू भी बांटे गए और उनको हुई फांसी के दिन को बलिदान दिवस के रूप में मनाया गया।

नाथूराम गोडसे की स्थापित की गई प्रतिमा।

आप जानकार हैरान हो रहे होंगे कि क्या गांधी के हत्यारे का भी कोई मंदिर बनाकर उनकी पूजा अर्चना कर सकता है। तो आप हैरान न हों, यह बिल्कुल हकीकत हैं क्योंकि अब गोडसे लोगों के लिए पूज्यनीय हो गए हैं। ऐसे में गोडसे की प्रतिमा स्थापना को लेकर बवाल मच गया है। महासभा ने इसे अपने लिए गौरव की बात बताया है तो भाजपा ने इस मामले से पल्ला झाड़ लिया है लेकिन कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर आक्रामक हो गई है।

हिंदू महासभा की ग्वालियर इकाई ने शहर के दौलत गंज स्थित कार्यालय में नाथूराम गोडसे की प्रतिमा स्थापित कर उसे मंदिर का रूप दे दिया है।जहां गोडसे के बलिदान दिवस यानी बुधवार को विधिवत तरीके से पूजा अर्चना कर और आरती उताकर मंदिर का शुभारंभ किया गया।
15 नवंबर का दिन ही क्यों चुना?
आपको बता दें कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद नाथूराम गोडसे को 15 नवंबर 1949 को अंबाला जेल में फांसी दी गई थी। ऐसे में हिंदू महासभा ने इस दिन को बलिदान दिवस के रूप में मनाने का निर्णय किया।

गोडसे ने ही की थी महासभा की स्थापना
नाथूराम गोडसे ने सन् 1915 में हिंदू महासभा की स्थापना की थी। जिस कार्यालय में उनकी प्रतिमा स्थापित कर मंदिर का रूप दिया गया है, गोडसे नगर प्रवास के दौरान उसी कार्यालय में रुकते थे।
बिना अनुमति के बना दिया मंदिर
महासभा ने बिना किसी अनुमति के मंदिर बना दिया है। इस मामले में महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डाॅ. जयवीर भारद्वाज का कहना था कि हमने जिला प्रशासन से मंदिर बनाने की इजाजत मांगी थी औ इसके लिए भूमि आवंटित करने की मांग भी की थी। लेकिन प्रशासन ने अभी तक हमें इजाजत नहीं दी, ऐसे में हमने कार्यालय को ही मंदिर का रूप देने का निर्णय किया और प्रतिमा स्थापित कर मंदिर का रूप दे दिया।
जानिये इस मामले में किसने क्या कहा ?

कोई राम पूजे या रावण हमें क्या लेना                                                                                                 महासभा ने मंदिर बनाया है इससे हमें कोई लेना देना नहीं है। न ही इस मामले में कोई टिप्पणी करना चाहता हूं। लोकतंत्र में सभी को अपने तरीके से जिंदगी जीने का अधिकार है। चोह कोई राम को पूजे या फिर रावण को। ऐसे में गोडसे को आदर्श मानने वालों की भी कमी नहीं है।
देवेश शर्मा, भाजपा जिलाध्यक्ष

हम करेंगे मंदिर का विरोध                                                                                                            ग्वालियर ऐतिहासिक नगरी है। इसका गौरवशाली इतिहास रहा है। ऐसे में ग्वालियर की पवित्र नगरी में गोडसे का मंदिर निर्माण यहां की गंगा-जमुनी तहजीब के खिलाफ है। इसके लिए हमने एक आवश्यक बैठक बुलाई, उसमें रणनीति तैयार की जाएगी कि विरोध में आंदोलन किस प्रकार किया जाए।         ….रमेश अग्रवाल, अध्यक्ष कांग्रेस आंदोलन समिति

नाथूराम ने 30 जनवरी को की थी गांधी की हत्या
हिंदू महासभा के संस्थापक नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिड़ला भवन में महात्मा गांधी की उस वक्त गोली मारकर हत्या कर दी थी, जब वे तनु और आभा के साथ प्रार्थना करने जा रहे थे। गोडसे ने गांधी को तीन गोली मारी थी, तीसरी गोली लगते ही गांधी हे राम कहकर जमीन पर गिर पड़े थे।

गोडसे द्वारा महात्मा गांधी की हत्या करते वक्त का दुर्लभ चित्र ।

ग्वालियर में ली थी पिस्टल चलाने की ट्रेनिंग
नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या करने के लिए ग्वालियर से विदेशी बैरेटा पिस्टल खरीदी थी। इसके लिए उन्होंने ग्वालियर में हिंदू संगठन चलाने वाले डाॅ. डीएस परचुरे की मदद ली थी। परचुरे ने अपनी दोस्त गंगाधर दंडवते के माध्यम से जगदीश गोयल से 500 रुपए में पिस्टल दिलवाई थी।

इसी पिस्टल से की गई थी महात्मा गांधी की हत्या।

इस पिस्टल को चलाने के लिए स्वर्ण रेखा नदी के किनारे 8-10 दिन गोडसे ने प्रेक्टिस की। उसके बाद अपने साथी आॅप्टे के साथ गोडसे ग्वालियर से दादर-अमृतसर पठानकोट ट्रेन से दिल्ली के लिए रवाना हो गए थे। उसके बाद उन्होंने गांधी की हत्या को अंजाम दिया।

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